Friday, 8 September 2017

ये निर्मल नीर गंगा का

ये निर्मल नीर गंगा का
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प्रोफेसर अब्दुल जब्बार, चित्तौड़, राजस्थान का रचा यह गीत

उजाले कर दे जीवन में
उमगें भर दे हर मन में
धो डाले गुनाहों को
मिटा दे मन की आहों को
दिखा दे नेक राहों को
ये निर्मल नीर गंगा का

वो चांदी सा चमकता है हिमाला इसके आंचल में
ये गुजरे पर्वतों के बीच जैसे बिजली बादल में
ये गुजरे पेड की झुरमुट में जैसे नैन काजल में
लगे कल कल की यूं आवाज जैसे घुंघरू पायल में
बहारे हैं बहारों पर
हो संध्या जब किनारों पर
जले य दीप धारों पर
ये निर्मल नीर गंगा का

मिले जिस खेत को ये जल कैसर में ढले सारा
उमड जाये हरी खेती वो मोती सा फले सारा
मवेशी मस्त मन चाहा पिलाये दूध की धारा
जहाँ उडता हुआ पंछी भजे हरिओम का नारा
भरे हिम्मत किसानों में
चमक चांदी सी दानों में
बढाये स्वाद खानों में
ये निर्मल नीर गंगा का

भटक जाता है जब कोई कभी जीवन की राहों में
हो पापी गिर गया हो पाप से जग निगाहों में
लगा ले ये गले उस को उठा ले अपनी बाहों में
संवारे हर जनम उसका भला अपनी पनाहों में
करे पत्थर को ये पावन
करे पतझड में भी सावन
थमाये पुण्य का दामन
ये निर्मल नीर गंगा का

लगा ले नैन से कोई तो ज्योति उसकी बढ जाये
लगा ले भाल से कोई मुकद्दर उसके बन जाये
हो खाली गोद मिले ये तो गोदी उसकी भर जाये
मिल बिछडा हुआ साथी जो इसके घाट पर जाये
है आशाओं भरा पानी
नहीं इसका कोई सानी
करे हम पर मेहरबानी
ये निर्मल नीर गंगा का

हमारी संस्कृति और देश की पहचान गंगाजल
रहा सदियों से संतों का यही गुणगान गंगाजल
मुसीबत में रखे सब का खरा ईमान गंगाजल
सुनो तुलसी के चन्दन में बना भगवान गंगाजल
सबल विश्वास है अपना
हकीकत है नहीं सपना
ये जल क्या मंत्र है अपना
ये निर्मल नीर गंगा का

हमें जीना तो बरसों है मगर मरने को है एक पल
उजाले जिन्दगी के आज बन जाये अंधेरे कल
करोडों की कमाई छोड घर में लाओ गंगाजल
सहारा स्वर्ग में होगा जो मुँह में होगा गंगाजल
ये भक्ति देश का दर्पण विदेशी एक आकर्षण
ये मेरे गीत का दर्शन
ये निर्मल नीर गंगा का

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